रक्षाबंधन का इतिहास (Raksha Bandhan History in Hindi)
रक्षाबंधन का इतिहास तीन परतों का है: पौराणिक कथा, 1829 की कर्णावती–हुमायूँ किंवदंती (जो समकालीन हुमायूँनामा में एक बार भी नहीं आती), और 16 अक्टूबर 1905 का अख़बारों में दर्ज राखी-बंधन। हर परत का स्रोत, वर्ष और प्रमाण-स्थिति अलग।
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- • रक्षाबंधन का इतिहास तीन अलग परतों का है — तिथि-रहित पौराणिक कथा, 1829 की मध्यकालीन किंवदंती, और 1905–1919 का दस्तावेज़ी इतिहास।
- • रानी कर्णावती और हुमायूँ की कहानी समकालीन हुमायूँनामा (अनुवाद 1902) के 745,672 बाइट पाठ में शून्य बार आती है; उसका सबसे पुराना प्रचलित स्रोत जेम्स टॉड की 1829 की पुस्तक है।
- • 16 अक्टूबर 1905 को कलकत्ता में रवींद्रनाथ ठाकुर के प्रस्ताव पर सामूहिक राखी-बंधन मनाया गया, और यह रीति 1911 तक हर साल दोहराई गई।
- • 1919 में भी यह केवल भाई-बहन का पर्व नहीं था — ब्राह्मण भी उसी दिन यजमानों की कलाई पर रक्षा बाँधते थे।
- • आज की चौथी परत मापी जा सकती है: SubhSandesh पर 2,466 रचनाकारों ने 15 पेज-प्रकारों में 2,973 पेज बनाए, जिनमें 51.1% व्यू फ़ोन पर हुए।
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रक्षाबंधन का इतिहास (Raksha Bandhan History in Hindi)
रक्षाबंधन का इतिहास एक सीधी रेखा नहीं, तीन अलग परतों का ढेर है — और तीनों को एक सूची में मिला देना इस विषय के लगभग हर हिंदी पेज की सबसे बड़ी ग़लती है। परत 1: पौराणिक कथाएँ (इंद्र–शची, कृष्ण–द्रौपदी, बलि–लक्ष्मी, यम–यमुना) — धार्मिक साक्ष्य, तिथिबद्ध इतिहास नहीं। परत 2: कर्णावती–हुमायूँ की मध्यकालीन किंवदंती, जिसका सबसे पुराना प्रचलित स्रोत 1829 की एक औपनिवेशिक पुस्तक है और जो समकालीन हुमायूँनामा (अनुवाद 1902) में एक बार भी नहीं आती। परत 3: प्रमाणित इतिहास — 1919 में दर्ज रीति, और 16 अक्टूबर 1905 का कलकत्ता का राखी-बंधन, जो अख़बारों में दर्ज है। परत 4 आज बन रही है: SubhSandesh पर 2,466 पंजीकृत रचनाकारों ने 15 पेज-प्रकारों में 2,973 व्यक्तिगत पेज बनाए हैं, जिनमें 99.4% (2,956) वाकई भेजे गए। नीचे हर परत का स्रोत, वर्ष और प्रमाण-स्थिति अलग-अलग है।
रक्षाबंधन का इतिहास क्या है — संक्षेप में
रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला त्योहार है, जिसमें कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा जाता है। "राखी" शब्द संस्कृत रक्षा से बना है — बचाना, रक्षा करना।
यह व्युत्पत्ति अनुमान नहीं है। बी. ए. गुप्ते की 1919 में छपी Hindu Holidays and Ceremonials इसे शब्दों में दर्ज करती है: राखी रेशमी धागे, चाँदी या सोने के तार, मूँगे और मोती से बनती थी, "according to means", और बहनें उसे भाइयों की कलाई पर वर्ष भर की रक्षा के लिए बाँधती थीं — "hence the name rakhi, from raksha — to protect"।
इससे पहले का कुछ भी तिथिबद्ध नहीं है। यही इस विषय की असली कठिनाई है।
परत 1 — पौराणिक कथाएँ: शास्त्र हैं, दस्तावेज़ नहीं
चार कथाएँ हर सूची में आती हैं। हर एक के लिए वही चार बातें, उसी क्रम में: कथा, स्रोत-ग्रंथ, काल, प्रमाण-स्थिति।
1. इंद्र और शची (इंद्राणी)
देवों और असुरों का बारह वर्ष चला युद्ध; बृहस्पति की सलाह पर इंद्र की पत्नी शची ने श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को इंद्र की दाहिनी कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा और देवता विजयी हुए। स्रोत-ग्रंथ भविष्य पुराण बताया जाता है। काल: पुराणों की उपलब्ध प्रतियाँ बहुत बाद की संकलित पांडुलिपियाँ हैं, कोई निश्चित वर्ष नहीं। प्रमाण-स्थिति: धार्मिक साक्ष्य — किसी घटना का दस्तावेज़ नहीं।
2. कृष्ण और द्रौपदी
शिशुपाल-वध के समय सुदर्शन चक्र से कृष्ण की उँगली कट गई; द्रौपदी ने साड़ी का पल्लू फाड़कर बाँध दिया और कृष्ण ने उसे बहन मान लिया। स्रोत-ग्रंथ: पुराण-कथा और लोक-परंपरा। काल: तिथि-रहित। प्रमाण-स्थिति: धार्मिक साक्ष्य; इससे कोई तारीख़ नहीं निकलती।
3. राजा बलि और लक्ष्मी
वामन-अवतार प्रसंग में लक्ष्मी ने बलि को रक्षा-सूत्र बाँधकर भाई बनाया और बदले में विष्णु की मुक्ति माँगी; वह दिन श्रावण पूर्णिमा था। स्रोत-ग्रंथ: पुराण-कथा। काल: तिथि-रहित। प्रमाण-स्थिति: धार्मिक साक्ष्य। ध्यान दें — यहाँ राखी बाँधने वाली बहन नहीं, देवी है, और सामने भाई नहीं, असुर-राजा है।
4. यम और यमुना
यमुना ने यम की कलाई पर धागा बाँधा; यम ने अमरता का वरदान और यह वचन दिया कि जो भाई बहन की रक्षा करेगा उसे दीर्घायु मिलेगी। स्रोत-ग्रंथ: पुराण-कथा। काल: तिथि-रहित। प्रमाण-स्थिति: धार्मिक साक्ष्य।
इन चारों में एक बात समान है: कोई तारीख़ नहीं।
एक दावा सुधार माँगता है। कई हिंदी पेज लिखते हैं कि रक्षाबंधन सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा है और वह सभ्यता "12 हज़ार ईसा पूर्व" की है। सिंधु घाटी सभ्यता लगभग 3300–1300 ईसा पूर्व की है — आँकड़ा करीब 8,700 वर्ष ग़लत है। और सिंधु लिपि आज तक अपठित है, इसलिए उसके अभिलेखों से किसी रीति का नाम पढ़ा ही नहीं जा सकता।
परत 2 — कर्णावती और हुमायूँ: यह कहानी कहाँ से आई
चित्तौड़ की विधवा रानी कर्णावती ने बहादुर शाह के आक्रमण के समय हुमायूँ को राखी भेजकर भाई बनाया और सहायता माँगी — यह कहानी हर पेज पर इतिहास के रूप में मिलती है। इसका सबसे पुराना प्रचलित स्रोत जेम्स टॉड की Annals and Antiquities of Rajast'han, खंड 1 (1829) है, और टॉड ख़ुद अपना आधार बता देते हैं: "According to the annals, he left Bengal at the solicitation of the queen Kurnavati" — यानी मेवाड़ की बारदाई अन्नल्स, कोई समकालीन दरबारी वृत्तांत नहीं।
टॉड का विवरण आधुनिक कथन से दो जगह टकराता है। पहला: उनके अनुसार "the festival of the bracelet (Rakhi) is in spring" — वसंत में, श्रावण पूर्णिमा को नहीं। दूसरा: यह भाई-बहन का पर्व नहीं, एक राजनीतिक-वीरतापूर्ण रीति थी — कोई राजपूत स्त्री किसी असंबंधित सामंत को "the title of adopted brother" देती थी और वह "Rakhi-bund Bhae" कहलाता था। टॉड ख़ुद 1820 के दशक में उदयपुर, बूँदी और कोटा की तीन रानियों तथा राणा की कुँवारी बहन चूँद-बाई से यह बंधन पा चुके थे।
अब समकालीन स्रोत। गुलबदन बेगम का हुमायूँनामा, ऐनेट बेवरिज का अनुवाद, रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, 1902 — हुमायूँ की सगी सौतेली बहन का लिखा संस्मरण। पूरे 745,672 बाइट के पाठ में rakhi शून्य बार, Karnavati/Karmavati शून्य बार, Chitor/Chittor शून्य बार, bracelet शून्य बार आता है। यह प्रसंग वहाँ नहीं है।
सीमा भी दर्ज होनी चाहिए: गुलबदन 1535 में लगभग ग्यारह वर्ष की थीं और उनका संस्मरण चुनिंदा है, इसलिए अनुपस्थिति असत्य का प्रमाण नहीं। पर इतना तय है — कहानी का सबसे पुराना उपलब्ध रूप 1829 की एक औपनिवेशिक संकलन-पुस्तक है, और वह इसे रक्षाबंधन नहीं, वसंत की अलग रीति बताती है।
सिकंदर और पोरस वाली कहानी की जाँच भी वैसी ही निकलती है। अरियन के The Anabasis of Alexander (चिन्नॉक अनुवाद, 1884) में Porus 31 बार और Roxana चार बार आते हैं, पर bracelet, wristlet, thread और amulet — चारों शून्य बार। रोक्साना का नाम केवल उनके बैक्ट्रियन परिवार और विवाह के प्रसंगों में है, पोरस के साथ कहीं नहीं।
परत 3 — प्रमाणित इतिहास: 1919 की दर्ज रीति और 16 अक्टूबर 1905
गुप्ते की 1919 की पुस्तक एक और बात दर्ज करती है जो आज के किसी पेज पर नहीं मिलती: भिक्षा लेने वाले ब्राह्मण भी राखी-पूर्णिमा मनाते थे और अपने यजमानों की कलाई पर रक्षा बाँधकर धन एकत्र करते थे। यानी सौ साल पहले भी यह केवल भाई-बहन का पर्व नहीं था — पुरोहित-यजमान का रक्षा-सूत्र उसी दिन का हिस्सा था।
और इस पूरे विषय की सबसे ठोस तारीख़ 1905 की है। इतिहासकार सुमित सरकार की The Swadeshi Movement in Bengal 1903–1908 (1973) के अनुसार, सितंबर 1905 के अंतिम सप्ताह की दो सभाओं में — 24 सितंबर कांसारीपाड़ा और 27 सितंबर सावित्री लाइब्रेरी, दोनों की अध्यक्षता रवींद्रनाथ ठाकुर ने की — उन्होंने बंग-भंग के दिन राखी-बंधन मनाने का प्रस्ताव रखा, "transforming a traditional popular rite into a symbol of the brotherhood and unity of the people of Bengal"।
नेताओं ने प्रस्ताव स्वीकार किया। 11 अक्टूबर से बंगाली अख़बार के हर अंक में अपील छपी: 16 अक्टूबर को सभी बंगाली एक-दूसरे को राखी बाँधें, "irrespective of class, caste or creed"। उस दिन कलकत्ता में जो हुआ, सरकार उसे "truly memorable scenes of fraternisation" कहते हैं — और लिखते हैं कि उसमें मुस्लिम मुल्ला, पुलिसकर्मी और अंग्रेज़ तक शामिल थे। यह रीति 1911 में बंग-भंग रद्द होने तक हर साल दोहराई गई। साथ में रामेंद्रसुंदर त्रिवेदी ने "अरंधन" सुझाया — उस दिन चूल्हा न जलाने का आह्वान।
यही एकमात्र परत है जिसकी तारीख़, अख़बार और सभा-स्थल तक दर्ज हैं।
तीनों परतों की तुलना, स्रोत और वर्ष के साथ
नीचे हर परत का सबसे पुराना जाँचा गया स्रोत, वर्ष और प्रमाण-स्थिति है — साथ में आज की मापी गई चौथी परत।
| परत | सबसे पुराना जाँचा गया स्रोत | वर्ष | प्रमाण-स्थिति |
|---|---|---|---|
| पौराणिक कथाएँ | भविष्य पुराण और लोक-परंपरा | तिथि अनिश्चित | धार्मिक साक्ष्य, घटना-दस्तावेज़ नहीं |
| कर्णावती–हुमायूँ | Tod, Annals and Antiquities of Rajast'han, Vol. I | 1829 | बारदाई अन्नल्स; समकालीन हुमायूँनामा में 0 उल्लेख |
| दर्ज लोकरीति | Gupte, Hindu Holidays and Ceremonials | 1919 | प्रत्यक्ष नृवंशविज्ञान विवरण |
| राखी-बंधन, कलकत्ता | Sarkar, The Swadeshi Movement in Bengal | 1973 (घटना 16 अक्टूबर 1905) | अख़बार-दस्तावेज़ी |
| डिजिटल राखी-संदेश | SubhSandesh का अपना डेटाबेस | 25 अगस्त 2026 को मापा | 2,973 पेज · 2,466 रचनाकार · 36,202 व्यू |
निष्कर्ष सीधा है: जितना पीछे जाते हैं, प्रमाण उतना कमज़ोर — और सबसे प्रसिद्ध "ऐतिहासिक" कहानी सबसे कमज़ोर प्रमाण पर खड़ी है।
यह रीति क्यों चलती रही, और आज कैसी दिखती है
रक्षाबंधन संग्रहालय की वस्तु नहीं बना, इसका एक कारण यह है कि उत्तर भारत में मायके का दावा आज भी व्यावहारिक संसाधन है। श्रुति चौधरी का शोध-पत्र "'For how long can your pīharwāle intervene?': Accessing natal kin support in rural North India" (Modern Asian Studies, 2019) ग्रामीण उत्तर प्रदेश के क्षेत्र-अध्ययन पर आधारित है, और इसके सार में दर्ज है कि वैवाहिक संकट में मायके का सहारा अक्सर स्त्री के पास एकमात्र उपलब्ध संसाधन होता है — जबकि दूरी, जाति और ग़रीबी उसकी सीमा तय कर देते हैं।
आज उस वचन का वाहक बदला है। धागा वही है, पर साथ भेजा जाने वाला संदेश अब कागज़ नहीं, एक लिंक है। SubhSandesh के आँकड़े इस चौथी परत का प्राथमिक स्रोत हैं: 36,202 दर्ज व्यू, प्रति पेज औसतन 12.2 व्यू, और साझा पेजों में 51.1% (18,497) फ़ोन पर खुलते हैं। 44.2% रचनाकार (2,973 में से 1,315) भेजने से पहले पासवर्ड लगाते हैं — यह ब्रॉडकास्ट नहीं, एक-को-एक संदेश का व्यवहार है।
अगर आप इस इतिहास को पढ़ने के बाद वही रक्षा-वचन आज भेजना चाहें, तो बहन से भाई के लिए रक्षाबंधन पेज भाई के नाम और भाई से बहन के लिए रक्षाबंधन पेज बहन के नाम दोनों टेम्पलेट मौजूद हैं; बाक़ी अवसरों के लिए पूरी टेम्पलेट सूची देखी जा सकती है।
यह पेज और यह टेम्पलेट कहाँ ग़लत विकल्प हैं
ईमानदारी से: SubhSandesh के राखी टेम्पलेट नए और बहुत कम इस्तेमाल हुए हैं। कुल 36,202 टेम्पलेट-व्यू में राखी पेजों का हिस्सा 39 व्यू — 0.1% है। अगर आपको प्रमाण चाहिए कि हज़ारों लोग यहाँ राखी पेज बना चुके हैं, वह प्रमाण अभी नहीं है, और उसे गढ़ने का कोई कारण नहीं।
दूसरी सीमा तकनीकी है। 51.1% पेज फ़ोन पर खुलते हैं, यानी 48.9% नहीं — और जिस बुज़ुर्ग रिश्तेदार के पास स्मार्टफ़ोन नहीं है, उनके लिए छपा फ़ोटो-अल्बम या डाक से भेजी राखी बेहतर है। एक ही घर में रहने वाले भाई-बहन के लिए लिंक का कोई अर्थ नहीं।
और सबसे साफ़ बात: यह इतिहास का पेज है। कालक्रम और स्रोत के लिए आए हैं तो वही लेकर जाइए — कुछ बनाना ज़रूरी नहीं।
स्रोत
- Sumit Sarkar, The Swadeshi Movement in Bengal 1903–1908 — People's Publishing House, 1973
- James Tod, Annals and Antiquities of Rajast'han, Vol. I — 1829
- Gulbadan Begum, The History of Humayun (Humayun-nama), trans. Annette S. Beveridge — Royal Asiatic Society, 1902
- B. A. Gupte, Hindu Holidays and Ceremonials — 1919
- Arrian, The Anabasis of Alexander, trans. E. J. Chinnock — 1884
- Shruti Chaudhry, "'For how long can your pīharwāle intervene?': Accessing natal kin support in rural North India" — Modern Asian Studies 53(5), 1613–1645, early online 6 May 2019 (सार पढ़ा गया; पूर्ण पाठ पेवॉल के पीछे)
- SubhSandesh का आंतरिक डेटाबेस — 25 अगस्त 2026 को मापा गया
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Written by
Suyash Agrahari
Founder
Suyash Agrahari is a Software Engineer at HireQuotient and the founder of SubhSandesh and DrawFlow (drawflow.in). He builds AI agents and full-stack products with Next.js, Node.js, and the OpenAI and LangChain ecosystems, having shipped autonomous multi-agent systems, AI copilots, and large-scale outreach platforms — and scaled side projects from a few hundred to millions of users. He writes about AI engineering, web development, and building products that grow through SEO and organic reach.
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